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बूँद बूँद से निर्मित
अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा

माहेश्वरी समाज की प्रबुद्धता

माहेश्वरी जाति की उत्पत्ति की जड़ में समाहित है - देवाधिदेव भगवान महेश का आशीर्वाद और मातेश्वरी पार्वती ( माता महेश्वरी ) का वात्सल्य भाव।

पूरा इतिहास गवाह है माहेश्वरी समाज के निर्मलत्व का। एक कदम आगे की सोच – यह मूल मंत्र है इस समाज का। इसी सोच ने आज से 125 वर्ष पहले ही समाज उत्थान की कल्पनाएं होने लगी। घर कर गई कुरीतियों की चर्चा होने लगी। बीड़ा उठाए जाने की बातें होने लगी। शनैः शनैः ऐसी कल्पनाओं ने एक रूपरेखा का ढांचा खड़ा किया। माहेश्वरी बन्धु एकत्रित होकर चिन्तन करने लगे और आज की विराट माहेश्वरी महासभा का शिशु प्रगट होने लगा।

1947 के भारतीय लोकतंत्र से बहुत पहले महासभा ने लोकतांत्रिक रूप को अपनाया और हरहमेश परिमार्जित भी किया। आज महासभा की प्रथम कड़ी है ग्राम सभा। तहसील के सारे ग्राम अपने प्रतिनिधि चुनकर भेजते हैं। उनका एक “कार्यकारीमण्डल” बनता है। फिर उस जिले की सारी तहसीलें मिल कर अपने चुने प्रतिनिधियों को भेजकर जिलासभा का निर्माण करती है। यहाँ फिर एक “जिला कार्यकारीमण्डल” का निर्माण होता है।

उस प्रदेश के सारे जिलों से आए प्रतिनिधि अपने में से एक “प्रदेश कार्यकारीमण्डल” का निर्माण करते हैं। जिला सभा का एक और दायित्व होता है – अपने परिवारों की संख्या के आधार पर जिस संख्या का निर्धारण महासभा अपने विधानानुसार करती है – उनका चयन भी करती है। जिला सभा भी अपने पूर्ण क्षेत्र में बसे परिवारों की संख्या के आधार पर महासभा के लिए सदस्यों का चयन करती है। सारी प्रक्रिया पूर्ण लोकतांत्रिक होती है। सर्वसम्मति के अभाव में मतदान भी होता है। इसे “महासभा कार्यकारीमण्डल” कहते हैं। सारे जिलों से चुने ऐसे सदस्यों को प्रदेश अध्यक्ष की अनुमति भी आवश्यक होती है। प्रदेश सभा कार्यकारीमण्डल सदस्य अपने में से कम से कम एक सदस्य को चुन कर महासभा की कार्यसमिति में भेजती है। प्रदेश अध्यक्ष कार्यसमिति का पदेन सदस्य होता है और प्रदेश मंत्री स्थायी विशेष आमंत्रित सदस्य होता है।



सत्रावसान से पहले महासभा का कार्यकारीमण्डल अगले सत्र के लिए अपने वर्तमान सत्र के अनुभवों के आधार पर पूरे पदाधिकारियों का चुनाव करता है। चार राष्ट्रीय पद – सभापति, महामंत्री, अर्थ मंत्री और संगठन मंत्री का चयन/चुनाव पूरे भारतवर्ष से आए कार्यकारीमण्डल सदस्य करते हैं। सभापति और महामंत्री अपने अपने कार्यालयों के लिए एक एक मंत्री की नियुक्ति करते हैं, और

पांच क्षेत्रों – पूर्वांचल, उत्तरांचल, पश्चिमांचल, मध्यांचल और दक्षिणांचल से एक एक उपसभापति और एक एक संयुक्तमंत्री का चयन/चुनाव उन्हीं क्षेत्रों के महासभा कार्यकारीमण्डल सदस्य करते हैं। इस तरह 4+2+10 =16 पदाधिकारियों का समूह नए सत्र का कार्यभार संभालता है। इस मंत्री मण्डल समूह में महासभा की दो इकाइयों ( महिला और युवा संगठन ) के अध्यक्षों और महामंत्रियों को भी स्थायी विशेष आमंत्रित किया जाता है। इस पारदर्शी परम्परा से नए सत्र का गठन होता है। नए सत्र की महासभा कार्यसमिति महासभा की मुख पत्रिका “माहेश्वरी” बोर्ड के चेयरमेन का चयन करती है। मुख्य चुनाव अधिकारी की नियुक्ति, 2 सदस्यों का सहवरण, विभिन्न समिति प्रमुखों का चयन भी करती है। महासभा की सारी सम्बद्ध संस्थाओं की गतिविधियों को सम्बन्धित “कार्यकारीमण्डल” ही स्वीकृत करता है। यही सर्वोच्च सदन है।

महासभा के मूल उद्देश्य है “सद्विचारों के उत्पादन का”। महासभा गम्भीरता से चिन्तन कर अपने विचार समाज-गंगा को समर्पित करती है और शनैःशनैः समाज उसे अंगीकार करता है। यही समाज और महासभा के चोली-दामन का सम्बंध है। आज का माहेश्वरी युवा कम ही जानता है कि कालांतर में ओसर-मोसर, पर्दाप्रथा, बाल विधवा संकट, बालिकाओं का अशिक्षित रहना, बालकों में अल्प शिक्षा, मुद्दाप्रथा, दहेजप्रथा…. न जाने कितनी रूढ़ियाँ पनप गई थी। महासभा ने आहिस्ते आहिस्ते उनको दूर किया। आज के परिवेश में झांके तो हम स्वयं को इन रूढ़ियों से मुक्त पाएंगे। 

महासभा की विशेष देन रही – “समाज का बोध चिन्ह” पहले व्यक्तिगत धनाढ्य परिवारों की धर्मशालाएं, मंदिर, कुए-बावड़ी, औषधालय, पाठशालाएं प्रायः देश भर में फैली हुई थी। महासभा की प्रेरणा से स्थानीय माहेश्वरी एकत्रित होने लगे और किंचित मात्र सहयोग भी विशाल धनराशि का सहभागी बना और माहेश्वरी भवन, सार्वहितार्थ स्कूलें, अस्पताल, होस्टल्स आदि के निर्माण का युग आया। आज आम माहेश्वरी भी बड़े भामाशाहों के साथ एक जाजम पर बैठकर चिंतन-मनन का भाग बनता है। उनकी बातों को तवज्जा दी जाती है। साधारण आर्थिक स्थिति के व्यक्ति के नेतृत्व में बड़े बड़े कार्य होते हैं। महासभा ने आगे बढ़ने के लिए कदम उठाये और आगे बढ़ी। महासभा की प्रेरणा से शनैःशनैः कई ट्रस्ट के निर्माण होने लगे।

– श्रीकृष्णदास जाजू की स्मृति में विधवा सहायता

– आदित्यविक्रम बिड़ला की स्मृति में व्यापार सहयोग ऋण

– रामगोपाल माहेश्वरी की स्मृति में शिक्षा सहयोग

– बांगड़ परिवार का चिकित्सा सहयोग

– बद्रीलाल सोनी की स्मृति में उच्चशिक्षा सहयोग

– काबरा परिवार का महिला उत्थान सहयोग

– बल्दवा परिवार का माध्यमिक शिक्षा सहयोग

– चुन्नीलाल सोमाणी की स्मृति में प्राथमिक शिक्षा सहयोग

इन सारे ट्रस्टों की मुख्य विशेषता रही – समस्त माहेश्वरी बन्धुओं से छोटा छोटा सहयोग लेना। मुख्य सहयोग कर्ताओं का 40% तो बूँद बूँद से 60% का सहयोग प्राप्त हो रहा है। महासभा की सारी इकाइयां इन ट्रस्ट्स से आम माहेश्वरी को सहायता करवा रही है। समाज के शौर्यवान व्यक्तित्वों का सम्मान भी होना चाहिए, इसे दृष्टिगोचर कर “अयोध्या की कार सेवा में शहीद हुए राम और शरद कोठारी” बन्धुओं की स्मृति में एक ट्रस्ट बना – कोठारी बन्धु शौर्य स्मृति ट्रस्ट। जब शिक्षा के लिए छात्र बाहर निकलने लगे तो महासभा फिर आगे आई। दूरदृष्टि से सोचकर शिक्षा के केंद्र शहरों में होस्टल्स बनाने की बड़ी स्कीम बनी। फिर तो कोटा, भिलाई, पुणे, बंगलोर, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, भीलवाड़ा आदि जगहों पर मुख्य सहयोग कर्ता के साथ आम माहेश्वरी जुड़कर होस्टल्स बनाते गए। 

आज छात्र-छात्राएं घर जैसे वातावरण में रहकर शिक्षा ले रहे हैं। महासभा के वर्तमान 28 वें सत्र में एक सर्वसम्मत निर्णय से एक रिलीफ फाउंडेशन (ट्रस्ट) का निर्माण हुआ। इस ट्रस्ट का संचालन महासभा के पदाधिकारियों की सहमति से होगा। इस ट्रस्ट के शुरू होते ही माहेश्वरी बन्धु जन्मदिन, शादी की वर्षगांठ, बच्चों की शादी, अन्यान्य अनेक तिथियों की यादगार में छोटी छोटी राशि भेंट करने लग गए हैं। उत्साह की पराकाष्ठा दिखने लगी है।

आज महासभा की विभिन्न इकाइयां अपने अपने क्षेत्रों में मेडिकल कैम्प, रक्तदान शिविर, चेतना लहर शिविर, कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर, तीर्थ यात्रा, पर्यटन, वृद्धजन सम्मान, कन्या सम्मान आदि अनेक कार्य क्रियान्वित कर रही है। 

महेश नवमी के विशेष कार्यक्रम होते हैं, सभी एक जाजम पर बैठकर जीमते हैं। पदाधिकारी तूफानी दौरा कर समाज को जागृत कर रहे हैं। इस सत्र में “आर्थिक-सामाजिक-शैक्षणिक सर्वेक्षण” जैसा दुष्कर कार्य भी हो रहा है। इस सर्वेक्षण के उद्देश्य अन्तिम पंक्ति पर खड़े परिवार को मुख्य धारा से जोड़ने का है और सबल परिवार की आर्थिक सहायता से अपने सफल जीवन की शुरुआत हो सके – ऐसी महत्वपूर्ण योजना है। 

अनेक अस्पताल, बड़ी बड़ी उत्पादक इकाइयों से सम्पर्क कर विशेष छूट की बात हो रही है, कुछ कार्य तो प्रारम्भ भी हो गए हैं। वहीं जरूरतमंद परिवारों को विभिन्न ट्रस्ट से जोड़ा जा रहा है। महासभा की मुख पत्रिका “माहेश्वरी” का उन परिवारों को निशुल्क वितरण करने का प्रयास है जिनकी आय वार्षिक एक लाख तक की है। 

न्यात गंगा का स्नान अमृत समान होता है। महासभा राष्ट्रीय उन्नति में कंधे से कंधा लगाकर अपना कर्तव्य निभा रही है। सभा की शुरुआत भगवान महेश की आराधना उपरांत राष्ट्रगीत “वंदेमातरम” से होती है। सर्वप्रथम समाज दिवंगतों के साथ शहीद वीरों को श्रद्धांजलि दी जाकर ही कार्यवाही प्रारम्भ होती है। सभा का समापन राष्ट्रगान “जन गण मन” से होकर भारतमाता के जयकारे से होता है।

महासभा संस्कार और संस्कृति, सहयोग और प्रेरणा, सेवा और सदाचार का निर्माण करने वाली संस्था है।