प्रादेशिक सभा
प्रादेशिक सभा
मॉडल विधान
दिनांक 27-28 मई, 2007 को महासभा कार्यसमिति की वृन्दावनबैठक में पारित
अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा
रजत जयन्ती सत्र 2006 -08
| पदाधिकारीगण | ||
| श्री रामपाल सोनी | भीलवाड़ा | सभापति |
| श्री कस्तुरचन्द बोहती | चैन्नईचैन्नई | महामंत्री |
| श्री दामोदरदास मूंदडा | राजनांदगांव | अर्थमंत्री |
| श्री रामकुमार मर्दा | इचलकरंजी | संगठन मंत्री |
| श्री जोधराज लढा | कोलकाता | उपसभापति (पूर्वांचल) |
| श्री मदनमोहन तापडिया | अलीगढ | उपसभापति (उत्तरांचल) |
| श्री रामगोपाल मूंदडा | सूरत | उपसभापति (पश्चिमांचल) |
| श्री शंकरलाल गिलडा | गुलबर्गा | उपसभापति (दक्षिणांचल |
| श्री चम्पालाल राठी | बिराटनगर | संयुक्तमंत्री (पूर्वांचल) |
| श्री मदनगोपाल तापडिया | कानपुर | संयुक्तमंत्री (उत्तरांचल) |
| श्री अशोक डागा | इन्दौर | संयुक्तमंत्री (पश्चिमांचल) |
| श्री बजरंगलाल बियाणी | मुम्बई | संयुक्तमंत्री (दक्षिणांचल) |
| श्री देवकरण गग्गड | भीलवाड़ा | संयुक्तमंत्री (केन्द्रीय कार्यालय) |
| केन्द्रीय विधान संशोधन समिति | ||
| श्री रामनिवास राठी | अहमदाबाद | संयोजक- पश्चिमांचल संयोजक |
| श्री अशोक बंग | चैन्नईचैन्नई | महामंत्री |
| श्री दामोदरदास मूंदडा | नासिक सदस्य | संयोजक दक्षिणांचल |
| श्री रमेश मर्दा | मुम्बई | सदस्य |
| श्री रमाशंकर झंवर | कलकत्ता | सदस्य |
| श्रीमती मनोरमा लढ़ा | ग्वालियर | सदस्य |
| श्री श्रीराम माहेश्वरी | वाराणसी | सदस्य |
| श्रीमती लता लाहोटी | पुणे | सदस्य |
| श्री अनिल कुमार मानधनिया | गौरखपुर | सदस्य-संयोजक पूर्वाचल |
| श्री रामनिवास झंवर | फरीदाबाद | सदस्य-संयोजक उत्तरांचल |
प्रादेशिक सभा का मॉडल विधान
(श्रृंखलाबद्ध संगठन पर आधारित)
1 नाम :-
इस संस्था का नाम .......................................................... प्रदेश माहेश्वरी सभा होगा।
2 कार्यक्षेत्र :-
इस संस्था का कार्यक्षेत्र अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा द्वारा निर्धारित किया हुआ क्षेत्र होगा। वर्तमान में निम्नलिखित राजस्व जिले इसका कार्यक्षेत्र होगा। कार्य सुविधा की दृष्टि से प्रदेश सभा अपने कार्यक्षेत्र के विभाग बना सकेगी। जिलों के नाम 1 ....................................... 2 ......................................... 3 ..................................................... आदि।
3 उद्देश्य :-
प्रदेश माहेश्वरी सभा अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा के संगठन का एक अंक होने से अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा के उद्देश्य ही प्रादेशिक सभा के उद्देश्य होंगे। अर्थात् समस्त भारतवर्षवासियों की उन्नति एवं प्रगति करने के व्यापक दृष्टिकोण के साथ माहेश्वरी समाज के समयानुकूल सर्वागीण उन्नति करना जिससे माहेश्वरी समाज राष्ट्र का एक प्रगतिशील घटक बना रहें। इस उद्देश्य पूर्ति हेतु निम्नलिखित एवं इनसे सम्बन्धित समयोचित कार्य करना -
1. समाज के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, व्यावसायिक, शेक्षणिक , शारीरिक उन्नति के लिए प्रयत्न करना। ऐसे कार्यों को साध्य करने के लिए आवश्यक संस्थाओं से सहयोग करना। पत्र, पत्रिकाएं, स्मारिकाएं एवं प्रचार साहित्य का प्रकाशन एवं वितरण करना।
2. रोजगार, व्यवसाय आदि के इच्छुक व्यक्तियों को मार्गदर्शन एवं सहयोग प्रदान करना। इस हेतु शिक्षण , प्रशिक्षण, भ्रमण, प्रदर्शन, सेमिनार आदि का आयोजन करना अथवा करवाना। सहकारी संस्थाओं के माध्यम से व्यवसायिक अवसर व आवासीय सुविधाएं बढ़ाना।
3. समाज के अभावग्रस्त लोगों की सहायता करना, छात्रवृत्ति अथवा ऋण छात्रवृत्ति तथा ऋण पर ब्याज अदायगी में सहयोग करना। आवश्यकता होने पर जरूरतमंद विद्यार्थियों को बैंको या अन्य संस्थानों से ऋण दिलाने में सहयोग प्रदान करना।
4. समाज के असहाय, बेरोजगार, अपंग, अस्वस्थ, निराश्रित एवं जरूरतमंद बालकों, बालिकाओं, महिलाओं एवं पुरूषों को सहयोग देना।
5. अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा के कार्यो में सहयोग करना व समाज में आई कुरीतियों को दूर करके स्वस्थ परम्पराओं के विकास का प्रयास करना।
6. अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा द्वारा स्थापित व संचालित संस्थाओं एवं न्यासों का लाभ यथा सम्भव अन्य समाज को भी देना।
7. जिन संस्थाओं द्वारा समाज के लोगों का लाभ पहुंचता हो उनकी सहायता करना, उनका संचालन करना और उनके संचालन में महासभा का प्रतिनिधित्व करना। राष्ट्रीय, सामाजिक व लोक कल्याण के अन्य कार्यों में भाग लेना तथा सहयोग करना।
8. प्रादेशिक सभा के उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए सभा, सम्मेलन, गोष्ठी, परिचर्चा, समारोह, प्रतियोगिता, प्रदर्शनी, खेल-कूद, व्यायाम, योगा, चलचित्र, नाटक आदि विविध कार्यक्रम आयोजित करना अथवा कराना। बालकों एवं वयस्कों को सुसंस्कारित करने हेतु कार्यकर्ता एवं व्यक्तित्व विकास शिविर, संस्कार शिविर, वर्ग आदि आयोजित करना।
9. निर्धारित कार्यों एवं योजनाओं के लिए धनसंग्रह करना, आवश्यकतानुसार ब्याज सहित अथवा ब्याज रहित ऋण लेना। चल अथवा अचल सम्पत्ति प्राप्त करना व धारण करना। सम्पत्ति सम्बन्धी क्रय, विक्रय, ऋण, बंधक, लीज आदि के अधिकार ग्रहण करना एवं तत्संबंधी नियम बनाना।
10. अन्य ऐसे कार्य करना जिससे समाज की उन्नति सम्भव हो।
4 बहिष्कार विषयक नीति :-
सभा में प्रस्तुत होने वाले किसी भी प्रस्ताव में सामाजिक बहिष्कार की नीति को स्थान नहीं दिया जाएगा।
5 परिभाषाएं :-
इस विधान में उल्लेखित विशिष्ट शब्दों का अर्थ निम्नानुसार समझा जाएगा -
1. 'महासभा' अथवा अखिल भारतवर्षीय शब्द से तात्पर्य ''अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा'' से है।
2. 'माहेश्वरी' द्गाब्द से तात्पर्य उन व्यक्तियों से है जो स्वयं को माहेश्वरी कहते हैं और जिन्हें समाज माहेश्वरी मानता है तथा जिनकी खाँप माहेश्वरी जाति की खाँपों में से है।
3. समाज, सामाजिक आदि शब्द माहेश्वरी समाज से है।
4. प्रदेश सभा-शब्द का तात्पर्य प्रदेश माहेश्वरी सभा से है।
5. जिला सभा, आंचलिक सभा, तहसील सभा, ग्राम, नगर सभा, क्षेत्रीय सभा आदि शॅब्दों का अर्थ निर्धारित क्षेत्रों की माहेश्वरी सभाओं से है।
6. कार्यकारी मण्डल का अर्थ प्रदेश माहेश्वरी सभा के कार्यकारी मण्डल से है।
7. 'कार्यसमिति' का अर्थ प्रदेश माहेश्वरी सभा की कार्यसमिति से है।
8. 'प्रादेशिक' शब्द का तात्पर्य ''प्रदेश माहेश्वरी सभा'' से है।
9. प्रादेशिक ट्रस्ट यानि प्रदेश माहेश्वरी सभा द्वारा स्थापित ट्रस्ट से है।
10. प्रथम स्तर कार्यकारी मण्डल-श्रृंखलाबद्ध संगठन में सब से पहली कड़ी ग्राम की होती है। ग्राम, नगर आदि मिलकर तहसील कार्यकारी मण्डल का गठन करते हैं। यह प्रथम स्तर कार्यकारी मण्डल है। यदि तहसील सभा कार्यरत नहीं होगी तो जिला सभा कार्यकारी मण्डल अथवा महानगरों की स्थिति में आंचलिक सभा प्रथम स्तर कार्यकारी मण्डल माना जायेगा। जहां जिला सभाएं कार्यरत नहीं होगी, वहां प्रादेशिक मण्डल प्रथम स्तर कार्यकारी मण्डल होगा।
6 कार्यालय :-
1. कार्यसमिति के निश्चयानुसार प्रदेश अध्यक्ष अथवा प्रदेश मंत्री का कार्यालय प्रदेश सभा का मुख्य कार्यालय होगा।
2. आवश्यक हो तो प्रदेश सभा कार्यकारी मण्डल की स्वीकृति से प्रदेश सभा के लेख, अभिलेख, प्रपत्र, महत्वपूर्ण कागजात आदि के लिए स्थाई कार्यालय का निर्माण कर सकेगी एवं वहां की व्यवस्था सम्बन्धी योजना बनायेगी।
7 प्रादेशिक संगठन के अवयव :-
ग्राम सभा अथवा स्थानीय सभा, नगर सभा, तहसील या नगरीय तहसील सभा, जिला सभा अथवा आंचलिक सभा, प्रदेश सभा एवं प्रदेश सभा द्वारा स्थापित ट्रस्ट अथवा न्यास।
8 प्रादेशिक सभा का गठन :-
प्रादेशिक सभा का गठन निम्न प्रकार से किया जायेगा :-
1 चयनित सदस्य
(अ) जिला सभाओं द्वारा चयनित प्रादेशिक कार्यकारी मण्डल के सदस्य (संलग्न परिशिष्ट के अनुसार)।
(ब) जिला सभाओं द्वारा चयनित महासभा कार्यकारी मण्डल के सदस्य (संलग्न परिशिष्ट के अनुसार)
2 पदेन सदस्य
1 . महासभा के समस्त पदाधिकारी एवं कार्यसमिति के सदस्य।
2 . महासभा के निवर्तमान एवं भूतपूर्व सभापति एवं महामंत्री।
3 . श्री कृष्णदास जाजू स्मारक ट्रस्ट के न्यासी अथवा प्रदेश संयोजक।
4 . श्री आदित्य विक्रम बिड़ला मेमोरियल व्यापार सहयोग केन्द्र के प्रबन्ध समिति के सदस्य, श्री रामगोपाल माहेश्वरी ट्रस्ट, कोठारी बन्धु शौर्य ट्रस्ट तथा महासभा द्वारा स्थापित अन्य ट्रस्ट के प्रबन्धन्यासी, अध्यक्ष एवं मंत्री।
5 . प्रादेशिक न्यास की प्रबन्धकारिणी के सदस्य अथवा ट्रस्टी (यदि प्रादेशिक न्यास सक्रिय रूप से कार्यरत हो तथा सदस्य दायित्व निर्वहन कर रहें हो)।
6 . प्रादेशिक सभा के निवर्तमान अध्यक्ष एवं मंत्री।
7 . प्रादेशिक महिला एवं युवा संगठन के वर्तमान अध्यक्ष एवं मंत्री।
8 . अ.भा. माहेश्वरी महिला एवं युवा संगठन के पदाधिकारी।
9 . जिला सभाओं के अध्यक्ष एवं मंत्री।
3 मनोनीत सदस्य
नवनिर्वाचित अध्यक्ष द्वारा प्रदेश कार्यकारी मण्डल के खयातिप्राप्त शास्त्री, लोक सभा, राज्य सभा तथा विधान सभा के सदस्य, प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पत्रकारों एवं समाज सेवियों में से पांच सदस्यों का मनोनयन किया जायेगा।
उपरोक्त क्रमांक 1 से 3 तक के सभी सदस्यों की सभा प्रदेश कार्यकारी मण्डल कहलायेगा तथा इन सभी सदस्यों के अधिकार एवं कर्त्तव्य समान होंगे।
9 सदस्यता :-
1. साधारण सदस्य -
प्रदेश सीमा में रहने वाले 18 वर्ष से अधिक उम्र वाले माहेश्वरी समाज के सभी स्त्री, पुरूष सामान्य सदस्य माने जाएंगे। संगठन का यह मूलाधार होगा। सभी साधारण सदस्य प्रदेश द्वारा आयोजित अधिवेशन में भाग ले सकें तथा अपने विचार व्यक्त कर सकेंगे।
2 चयनित सदस्य -
प्रदेश के साधारण सदस्य निर्धारित शुल्क देकर स्थानीय संगठन के (एक परिवार से एक सदस्य) सदस्य बन सकेंगे। स्थानीय संगठन से निर्वाचित सदस्य ही संलग्न परिशिष्ट में दिये गये निर्देशानुसार प्रदेश सभा कार्यकारी मण्डल के सदस्य बन सकेंगे। इन्हें प्रदेश कार्यसमिति द्वारा निर्धारित सत्र शुल्क देना होगा।
3 पदेन सदस्य -
प्रदेश सभा के विधान की धारा 8 (2) में वर्णित सदस्य प्रदेश कार्यकारी मण्डल के पदेन सदस्य होंगे। इन्हें प्रदेश कार्यसमिति द्वारा निर्धारित सत्र शुल्क देना होगा।
4 सहयोगी सदस्य -
प्रदेश सभा की कार्यसमिति द्वारा समय-समय पर निर्धारित की गई राशी देकर सहयोगी सदस्यता पूरे सत्र के लिए प्राप्त हो सकेगी। सहयोगी सदस्य को कार्यकारी मण्डल की प्रत्येक बैठक की सूचना दी जाएगी। विषयों की चर्चा में वे सहभागी हो सकेंगे लेकिन उन्हें मतदान एवं चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं होगा।
10 सदस्यता से निष्कासन/पद मुक्ति/अलग होना :-
1 . पागलपन अथवा मृत्यु होने पर।
2 . त्याग पत्र देने के बाद स्वीकृत होने पर।
3 . संस्था के उद्देश्यों के विपरीत आचरण करने पर।
4 . प्रदेश की कार्यसमिति द्वारा दोषी करार देने पर।
5 प्रदेश कार्यकारी मण्डल के सदस्यों की सभा में उपस्थित 2/3 सदस्यों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पास कर देने पर। ऐसे मामले में पूर्व में एजेण्डा में सूचित होने चाहिए।
6 . न्यायालय द्वारा नैतिक अपराध में दण्डित होने पर।
7 . अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा अथवा प्रादेशिक माहेश्वरी सभा से असम्बन्ध समानान्तर संस्था/संगठन की सदस्यता ग्रहण करने पर।
8 . सदस्यता त्यागने पर।
9 . संगठन सम्बन्धी विवाद को न्यायालय में ले जाने पर।
नोट :- निष्कासन/पदमुक्ति की कार्यवाही करने से पूर्व आगे नियमों का उल्लघंन तथा अनुशासनात्मक कार्यवाही शीर्षक के अन्तर्गत दी गई प्रक्रिया अपनाई जावेगी।
11 प्रदेश कार्यकारी मण्डल के अधिकार एवं कर्त्तव्य :-
1 . संगठन के कार्य की दृष्टि से निर्धारित क्षेत्रानुसार जिला/आंचलिक सभाओं का गठन कराना तथा प्रत्येक क्षेत्र में निवास करने वाले परिवारों के आधार पर गठन हेतु विधान के अन्त में दिये गए परिशिष्ट में उल्लेख को ध्यान में रखते हुए आधार बनाना और चुनाव की व्यवस्था हेतु प्रदेश कार्यसमिति के माध्यम से जिला सभाओं को निर्देश देना।
2 . प्रदेश कार्यसमिति का चुनाव कराना।
3 . वार्षिक बजट पारित करना एवं कार्यसमिति द्वारा स्वीकृत वार्षिक अंकेक्षित हिसाब का अनुमोदन करना।
4 . कार्यसमिति द्वारा किए गए कार्यों की समीक्षा करना व पुष्टि करना और प्रादेशिक सभा के कार्यों के सम्बन्ध में नीति निर्धारित करना।
5 . संस्था के विधान में संशोधन, परिवर्तन अथवा परिवर्द्धन (इस हेतु आगे दिये गए प्रावधानों के अनुसार) करना।
6 . प्रदेश सभा एवं महासभा के उद्देश्यों को अग्रसर करने एवं उनमें पारित प्रस्तावों के क्रियान्वयन का दायित्व प्रदेश कार्यकारी मण्डल पर होगा। इन कार्यों के सम्बन्ध में विविध योजनायें निर्धारित करने नियम, उपनियम बनाने एवं आवश्यकतानुसार संगठन अथवा समितियां/उपसमितियां स्थापित करने का अधिकार होगा।
7 . सत्र के बीच में प्रदेश के अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर शेष कालावधि के लिए अध्यक्ष का चुनाव करना।
8 . प्रदेश कार्यकारी मण्डल के जो सदस्य है, बिना सूचना दिये लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहते हैं उनके स्थान रिक्त घोषित किये जायेगे एवं रिक्त स्थान पर अध्यक्ष द्वारा शेष अवधि हेतु नये सदस्य सम्बन्धित क्षेत्र की जिला सभा की सहमति से मनोनीत किए जा सकेंगे। परन्तु स्थान रिक्त घोषित करने से पूर्व सम्बन्धित सदस्य को इसकी सूचना देकर 15 दिन की अवधि में उत्तर मांगा जावेगा।
9 . महासभा से सम्बद्धता प्राप्त करना। (इस हेतु उसे महासभा के निर्देशों एवं आदेशों का पालन करना होगा तथा निर्धारित सत्र शुल्क जमा कराना होगा)।
12 (क) प्रदेश कार्यकारी मण्डल की बैठके :-
1 . अध्यक्ष की सहमति से प्रदेश मंत्री द्वारा कार्यकारी मण्डल की बैठकें आवश्यकतानुसार बुलाई जा सकेगी, परन्तु वर्ष में दो बैठके बुलाना अनिवार्य होगा। आवश्यकता पड़ने पर विशेष सभा अध्यक्ष या मंत्री द्वारा भी बुलाई जा सकेगी। यह बैठक चुनाव बैठक के अलावा होगी।
2 . प्रदेश कार्यकारी मण्डल की बैइक का कोरम कुल सदस्यों का 1/3 सदस्यों का होगा, जिसमें न्यूनतम तीन पदाधिकारियों की उपस्थिति आवश्यक होगी।
3 . बैठक की सूचना 15 दिन पूर्व डाक अथवा उचित माध्यम से एवं अत्यावश्यक अथवा अधियाचित बैठक की सूचना डाक से यू.पी.सी./ई-मेल द्वारा 7 दिन पूर्व दी जायेगी।
4 . प्रदेश कार्यकारी मण्डल की बैठक में साधारणतः उन्हीं विषयों पर विचार किया जा कसेगा जो विचारार्थ विषयों की सूची में प्रसारित किए गए है, परन्तु अध्यक्ष की अनुमति से अन्य विषयों पर भी विचार किया जा सकेगा। आय व्यय पत्रक वर्ष में एक बार पेश किया जावेगा।
5 . प्रदेश कार्यकारी मण्डल की बैठक की तिथि से कम से कम एक माह पूर्व प्रदेश कार्यालय में प्राप्त प्रस्तावों व सुझावों को अध्यक्ष की पूर्व अनुमति से विचारार्थ रखा जा सकेगा।
(ख) स्थगित बैठक :-
कोरम के अभाव में बैठक स्थगित की जा सकेगी। जो बैठक की सूचना के साथ प्रसारित स्थगन सम्बन्धी सूचनानुसार अथवा पुनः आधा घण्टा पश्चात आहूत की जा सकेगी। ऐसी स्थगित बैठक में कोरम की कोई आवश्यकता नहीं होगी। विचाराधीन विषय वहीं होंगे जो पूर्व प्रसारित एजेण्डा में थे, परन्तु विधान संशोधन अथवा चुनावी कार्य नहीं होगा।
(ग) अधियाचित बैठक :-
कार्यकारी मण्डल के 1/3 सदस्यों के लिखित आवेदन पर मंत्री या अध्यक्ष द्वारा दो माह के अन्दर-अन्दर अधियाचित बैठक आहूत करना अनिवार्य होगा। निर्धारित अवधि में अध्यक्ष या मंत्री द्वारा बैठक नहीं बुलाए जाने पर उक्त सदस्यों में से कोई भी दस सदस्य आवेदन की तिथि के दो माह बाद १ दिन का समय देकर बैठक बुलाने के लिए नोटिस जारी कर सकेंगे तथा इस प्रकार की बैठक में होने वाले समस्त निर्णय वैधानिक व सर्वमान्य होंगे। बैठक बुलाने की सूचना यू.पी.सी. द्वारा दी जावेगी। इस बैठक में अधियाचित बैठक बुलाने हेतु किए गए आवेदन में उल्लिखित विषयों पर ही विचार हो सकेगा।
13 प्रदेश की कार्यसमिति का गठन
1 . प्रदेश कार्यसमिति में निर्वाचित/चयनित पदाधिकारियों एवं सदस्यों की संखया निम्न प्रकार होगी -
अ. कार्यकारी मण्डल के कुल सदस्यों की संखया 150 तक होने पर-31
ब. कार्यकारी मण्डल के कुल सदस्यों की संखया 150 से अधिक होने पर-41
2 . कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रादेशिक कार्यकारी मण्डल द्वारा कार्यसमिति का गठन किया जायेगा। कार्यसमिति में पदाधिकारी व सदस्य निम्न प्रकार होंगे :-
1 . अध्यक्ष - 1
2 . उपाध्यक्ष - 3 से 6 तक (सम्भाग के अनुसार)
3 . प्रदेश मंत्री - 1
4 . अर्थमंत्री एक - 1
5 . संगठन मंत्री - १ या २ (आवश्यकतानुसार)
6 . संयुक्त मंत्री - 3 से 6 तक (सम्भाग के अनुसार)
7 . सह मंत्री - 1 (अध्यक्ष द्वारा प्रदेश मंत्री की सहमति से मनोनीत)
8 . सदस्य - 31 या 41 में से उपरोक्त तथा अध्यक्ष द्वारा मनोनीत 2/3 सदस्यों को कम कर शेष सदस्यों का चुनाव होगा।
नोट - प्रदेश के विस्तृत क्षेत्रफल एवं जनसंखया को देखते हुए जहां वरिष्ठ उपाध्यक्ष का पद सृजन है तो वहां वह पद रखा जा सकेगा।
3 . उपरोक्त 13 (2) में वर्णित सदस्यों के अतिरिक्त प्रदेश सभा क्षेत्र में निवास करने वाले निम्नलिखित महानुभाव कार्यसमिति के पदेन सदस्य होंगे। पदेन सदस्यों को चयनित सदस्यों के समान अधिकार प्राप्त होंगे।
1 महासभा के समस्त पदाधिकारी एवं कार्यसमिति सदस्य।
2 महासभा के निवर्तमान एवं भूतपूर्व सभापति एवं मंत्री।
3 निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष व मंत्री।
4 महिला एवं युवा संगठन के प्रदेश अध्यक्ष एवं मंत्री।
5 जिला अथवा समकक्ष सभा के अध्यक्ष।
6 प्रादेशिक ट्रस्ट के अध्यक्ष अथवा प्रबन्धन्यासी अथवा मंत्री।
4 . आवश्यकतानुसार अन्य सदस्यों को विशेष आमन्त्रित के रूप में बुलाने का अधिकार अध्यक्ष को होगा। कार्यसमिति की बैठक के कोरम हेतु विशेष आमन्त्रित सदस्यों को नहीं गिना जावेगा।
14 कार्यसमिति का निर्वाचन :-
1 . प्रदेश सभा की कार्यसमिति का चुनाव 3 वर्ष की अवधि के लिए प्रदेश कार्यकारी मण्डल के सदस्यों द्वारा किया जावेगा।
2 . चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा किया जावेगा। धारा 8 (1 से 3) तक में वर्णित सदस्य ही चुनाव में भाग ले सकेंगे एवं प्रत्याशी भी बन सकेंगे।
3 . चुनाव अधिकारी की नियुक्ति चालू सत्र की कार्यसमिति द्वारा की जावेगी तथा चुनाव के समय पर्यवेक्षक भेजने हेतु महासभा से चुनाव की तिथि से कम से कम एक माह पूर्व निवेदन किया जावेगा।
4 . कार्यसमिति के पदाधिकारियों का निर्वाचन नीचे लिखे अनुसार होगा -
अध्यक्ष - अध्यक्ष का चुनाव प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा किया जावेगा। सत्र के बीच में अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर शेष कालावधि के लिए अध्यक्ष का चुनाव प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा ही किया जावेगा। उक्त चुनाव सभा की सूचना निद्गिचत तिथि से 21 दिन पूर्व जारी करना आवश्यक होगा।
उपाध्यक्ष - उपाध्यक्ष का चुनाव प्रदेश कार्यकारी मण्डल के सम्बन्धित सम्भाग के सदस्यों द्वारा किया जायेगा। प्रत्येक सम्भाग से एक उपाध्यक्ष चुना जावेगा।
प्रदेश मंत्री - प्रदेश मंत्री का चुनाव प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा किया जावेगा।
अर्थमंत्री - अर्थमंत्री का चुनाव प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा किया जावेगा।
संगठन मंत्री - संगठन मंत्री का चुनाव प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा किया जावेगा। संगठन मंत्री का पद एक से अधिक अथवा सम्भाग के अनुसार होने पर सम्भाग से सम्बन्धित कार्यकारी मण्डल के सदस्यों द्वारा किया जावेगा।
संयुक्त मंत्री - संयुक्त मंत्री का चुनाव प्रदेश कार्यकारी मण्डल के सम्बन्धित सम्भाग के सदस्यों द्वारा किया जाएगा। प्रत्येक सम्भाग से एक संयुक्त मंत्री चुना जाऐगा।
सह मंत्री - अध्यक्ष द्वारा प्रदेश मंत्री की सहमति से मनोनीत किया जावेगा।
सदस्य - प्रदेश कार्यकारी मण्डल के सदस्यों में से दो/तीन सदस्य अध्यक्ष द्वारा मनोनीत किय जायेगे व शेष का आवंटन प्रदेश कार्यसमिति द्वारा जिलों को उचित प्रतिनिधित्व देते हुए किया जावेगा।
5 . पदाधिकारियों हेतु अहर्ताएं निम्नानुसार होंगी -
अध्यक्ष -
(अ) न्यूनतम आयु 40 वर्ष हो।
(आ) पूर्व में प्रादेशिक सभा का पदाधिकारी रहा हो एवं कार्यकारी मण्डल का दो सत्र तक सदस्य रहा हो। अथवा महासभा कार्यसमिति का एक सत्र तक एवं प्रदेश कार्यसमिति का एक सत्र तक सदस्य रहा हो।
प्रदेश मंत्री -
(अ) न्यूनतम आयु 35 वर्ष हो।
(आ) एक पूर्ण सत्र तक प्रदेश का पदाधिकारी रहा हो अथवा महासभा अथवा प्रदेश कार्यकारी मण्डल एवं प्रदेश कार्यसमिति का एक-एक सत्र तक सदस्य रहा हो।
अन्य पदाधिकारी -
(अ) न्यूनतम आयु 35 वर्ष हो।
(आ) एक पूर्ण सत्र तक प्रदेश कार्यसमिति का अथवा दो पूर्ण सत्र तक प्रदेश कार्यकारी मण्डल का सदस्य रहा हो।
15 कार्यसमिति के अधिकारी एवं कर्त्तव्य :-
प्रदेश सभा की कार्यसमिति के निम्नलिखित अधिकार एवं कर्त्तव्य होंगे -
1 . प्रदेश कार्यकारी मण्डल के प्रति उत्तरदायित्व निभाना।
2 . प्रदेश सभा की सत्रवार एवं वर्ष वार योजना एवं कार्यक्रमों का निर्धारण करना तथा उसका कलेण्डर बना तदनुसार कार्यों को सम्पादित कराना।
3 . समय-समय पर योजनाओं एवं कार्यक्रमों का मूल्यांकन कर अनुवर्ति कार्यक्रम बनाना।
4 . जिला सभाओं से सत्रवार एवं वर्ष वार योजना एवं कार्यक्रम बनवा कर उनका अनुमोदन करना तथा इस हेतु मार्गदर्शन देना।
5 . पूरे प्रदेश को संगठित एवं क्रियाशील बनाये रखने हेतु विभिन्न प्रकार से मार्गदर्शन देना।
6 . वार्षिक बजट तैयार करना एवं वार्षिक अंकेक्षित हिसाब को प्रदेश कार्यकारी मण्डल में रखने से पूर्व उन्हें पारित करना।
7 . सभा की सम्पति की सुरक्षा करना। उसकी चल-अचल सम्पति, पूंजी, भवन निर्माण व उनकी व्यवस्था करना तथा दान व सहयोग राशी तथा भेंट/उपहार आदि प्राप्त करना।
8 . वैतनिक कर्मचारियों की नियुक्ति करना तथा उनके वेतन व भत्तों आदि का निर्धारण करना तथा उनकी सेवा शर्ते तय करना, सेवा मुक्त करना आदि।
9 . आवश्यकतानुसार कार्यसमिति में पदों की संख्या में वृद्धि या कमी करना अथवा नये पद सृजित करना। इन्हें प्रदेश कार्यकारी मण्डल की अगली बैठक में अनुमोदित कराना।
10 . जिला सभाओं की कार्यसमिति में एक सदस्य मनोनीत करना ताकि प्रदेश एवं जिला सभा में समन्वय बना रहें।
11 . निर्धारित उद्देश्यों को अग्रसर करना एवं प्रदेश कार्यकारी मण्डल में पारित प्रस्तावों के क्रियान्वयन का दायित्व हन करना।
12 . विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु विभिन्न समितियों एवं प्रकोष्ठों का गठन करना तथा उनके लिए कार्य विधि एवं कार्यक्षेत्रों का निर्धारण करना। इनके कार्य संचालन हेतु नियम बनाना। ये सभी नियम विधान एवं नियमावली के भाग समझे जावेगे।
13 . प्रादेशिक सभा की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने हेतु प्रयास करना एवं निर्णय लेना।
14 . महासभा कार्यकारी मण्डल हेतु जिला सभाओं से प्राप्त नामों का अनुमोदन कर उन्हें शुल्क सहित महासभा को प्रेषित करना।
15 . प्रदेश स्तरीय विभिन्न चुनावों के लिए आवश्यकतानुसार चुनाव अधिकारी की नियुक्ति करना।
16 . चुनावों सम्बन्धी नियम व उपनियम बनाना।
17 . हिसाब की जांच हेतु आन्तरिक अंकेक्षण नियुक्त करना और ऑडिट हेतु चार्टड अकाउन्टेन्ट नियुक्त करना।
18 . महासभा और प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा निर्धारित नीति एवं प्रस्तावों की क्रियान्विति करना।
19 . जो पदाधिकारी/सदस्य बिना सूचना दिए लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहते हैं, उनके स्थान रिक्त घोषित किए जा सकेंगे, परन्तु स्थान रिक्त घोषित करने से पूर्व सम्बन्धित सदस्य को इसकी लिखित सूचना देकर 15 दिन की अवधि में उत्तर मांगा जावेगा। निर्धारित समय में उत्तर नहीं आने पर स्थान रिक्त घोषित कर दिया जावेगा। रिक्ति की पूर्ति कार्यसमिति की बैठक में शेषकालावधि के लिए करना।
20 . महासभा की कार्यसमिति के लिए सदस्य/सदस्यों का चुनाव प्रदेश से अ.भा. माहेश्वरी महासभा कार्यसमिति मण्डल के सदस्यों में से करना।
21 . कार्यसमिति में पदाधिकारियों (अध्यक्ष के अतिरिक्त) और महासभा कार्यसमिति सदस्यों का स्थान रिक्त होने पर रिक्त स्थान की प्रर्ति शेषकालावधि हेतु करना।
22 .प्रदेश कार्यकारी मण्डल, कार्यसमिति एवं पदाधिकारियों से लिया जाने वाला शुल्क समय-समय पर निर्धारित करना।
23 . प्रदेश के अध्यक्ष और अथवा अन्य पदाधिकारियों के द्वारा अपने पद से त्याग पत्र देने पर त्यागपत्र को स्वीकार करना।
24 . निधन, अनुपस्थिति, त्याग पत्र अथवा अन्य कारण से प्रदेश कार्यकारी मण्डल में सदस्यों के जो स्थान रिक्त होते हैं उनके स्थान पर शेषकालावधि हेतु नये सदस्य का मनोनयन/चयन करना।
25 . स्थानीय सभा स्तर पर सदस्यता हेतु सदस्यता शुल्क का निर्धारण करना।
26 . जिला अथवा समकक्ष संगठनों का सत्र सम्बद्धता शुल्क निर्धारण करना व सम्बद्धता प्रदान करना।
16 कार्यसमिति की बैठके :-
1 . कार्यसमिति की सत्र में कम से कम 3 बैठके अनिवार्य रूप से होगी, लेकिन आवश्यकता होने पर अध्यक्ष/मंत्री द्वारा कभी भी बैठक बुलाई जा सकेगी।
2 . बैठक का कोरम 1/3 सदस्यों का माना जावेगा जिसमें तीन पदाधिकारियों की उपस्थिति आवश्यक होगी। पदेन एं आमन्त्रित सदस्यों को कोरम हेतु शामिल नहीं माने जायेंगे।
3 . बैठक की सूचना प्रायः 15 दिन पूर्व दी जावेगी, परन्तु अत्यावश्यक बैठक की सूचना तीन दिन के समय में भी दी जा सकती है।
4 . कोरम के अभाव में बैठक स्थगित की जा सकेगी, जो बैठक के एजेण्डा में प्रसारित सूचना के अनुसार पुनः आधे घण्टे पश्चात निर्धारित स्थान व समय पर होगी लेकिन विचारणीय विषय वहीं होंगे जो पूर्व एजेण्डा में थे। इस बैठक में उपस्थित सदस्यों के अलावा कम से कम तीन पदाधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य होगी। स्थगित बैठक में कार्यवाही की पुष्टि आगामी कार्यसमिति की बैठक में कराना आवश्यक होगा।
5 . बैठक की सूचना कोरियर, ई-मेल, साधारण डाक से, यू.पी.सी. से दी जावेगी जो पर्याप्त मानी जावेगी।
17 पदाधिकारियों के कर्त्तव्य व अधिकार :-
अध्यक्ष -
1 . प्रदेश कार्यकारी मण्डल, कार्यसमिति और प्रदेश स्तर की सभी बैठकों की अध्यक्षता करना।
2 . प्रदेश सभा के कार्य संचालन हेतु उत्तारदायी होंगे एवं सभा को गतिशील रखने तथा उद्देश्यों की पूर्ति का प्रयास करना।
3 . प्रदेश एवं जिला सभा के कार्यक्रमों एवं योजनाओं का समय-समय पर विश्लेषण कर आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करना।
4 . समितियों एवं उपसमितियों को सक्रिय रखते हुए उनके कार्यक्रम में सहयोग प्रदान करना।
5 . बैठकें आहूत करने तथा उसकी व्यवस्था करने हेतु मंत्री को निर्देश देना।
6 . आवश्यकता होने पर बराबर मत आने पर निर्णायक मत देना।
7 . महासभा एवं अन्य स्थानों पर सभा का प्रतिनिधित्व करना।
8 . संविदा और अन्य दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना।
9 . विभिन्न पदाधिकारियों व समितियों को कार्य वितरण करना।
10 . संगठन को सुदृढ़ करने हेतु भ्रमण करना। जिला एवं प्रदेश स्तर के सम्मेलन आयोजित कराने का प्रयास करना।
11 . जिला सभाओं को गतिशील रखने हेतु मार्गदर्शन करना व अन्य आवश्यक कार्यवाही करना।
12 . अपने स्वविवेक से 5 हजार रूपये तक (एक समय में) खर्च करने की स्वीकृति देना, जिसकी पुष्टि कार्यसमिति की आगामी बैठक में कराई जावेगी।
13 . अन्य कार्य व निर्णय लेना जो समयानुकूल आवश्यक हो।
14 . जिला क्षेत्र में वहां के कार्यकारी मण्डल अथवा जिला कार्यकारी मण्डल के चुनाव निर्धारित समय में नहीं होने की स्थिति में धारा 22 (चार) की प्रक्रिया पूरी करते हुए सम्बन्धित जिला सभा को भंग करना। किसी जिला क्षेत्र में संगठन स्थापित न हो सकने की स्थिति में उन क्षेत्रों में चुनाव कराने तथा नये निवार्चित पदाधिकारियों के पद ग्रहण करने तक संस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु तदर्थ समिति अथवा संयोजक का मनोनयन करना। उन जिला क्षेत्रों से निर्धारित संखया में महासभा व प्रदेश सभा आदि हेतु प्रदेश मंत्री के परामर्श से सदस्य मनोनीत करना तथा इसका अनुमोदन आगामी कार्यसमिति की बैठक में कराना।
उपाध्यक्ष -
1 . अपने-अपने सम्भागों में जिला सभाओं को सक्रिय रखने हेतु समय-समय पर भ्रमण करना और उनका मार्गदर्शन करना तथा सम्भागीय स्तर/जिला स्तर पर कार्य गोष्ठियां अथवा बैठके आदि आयोजित कर समाज को गतिशील रखना एवं सदस्यों को सक्रिय रखना एवं चुनाव आदि कराना।
2 . प्रदेश के विभागीय कार्य सम्पादित कराने में तथ प्रदेश द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों/कार्यों को सम्पादित करने में पूर्ण जानकारी निभाना।
3 . अध्यक्ष तथा प्रदेश मंत्री को पूर्ण सहयोग देना।
प्रदेश मंत्री -
1 . प्रदेश सभा के कार्यालय व कार्यों का संचालन करना। सभा, सम्मेलन, प्रदेश कार्यकारी मण्डल तथा कार्यसमिति की बैठके अध्यक्ष के परामर्श से आयोजित करना।
2 . बैठके आहूत करने हेतु कार्य सूची बनाना, उनको सदस्यों को भेजना, बैठकों का संचालन करना व कार्यवाही का रिकार्ड रखना एवं उनकी क्रियान्विति सुनिश्चित करना।
3 . सभा से सम्बन्धित कर्मचारियों को कार्यसमिति की स्वीकृति से नियुक्त करना उन पर नियन्त्रण रखना तथा उनके वेतन बिल आदि पास कर भुगतान करने को अर्थ मंत्री को निर्देश देना।
4 . प्रदेश कार्यकारी मण्डल तथा कार्यसमिति के निर्णयानुसार सभा का कार्य करना तथा स्वीकृत बजट के अनुसार खर्च करना व खर्चों पर नियन्त्रण रखना।
5 . प्रदेश सभा के अध्यक्ष की सम्मति से सत्र एवं वर्ष वार योजना एवं कार्यक्रम बना उसे कार्यसमिति से अनुमोदित कराना तथा इसकी जानकारी एवं प्रगति से कार्यकारी मण्डल को अवगत कराना।
6 . महासभा से आये पत्रों को जिला एवं तहसील स्तर पर प्रसारित करना।
7 . कार्यसमिति द्वारा गठित समितियों/उपसमितियों का कार्य एवं क्षेत्र निर्धारित कर उनसे कार्य करवाना।
8 . अन्य पदाधिकारियों को कार्य में मदद व मार्गदर्शन करना और समस्त गतिविधियों की जानकारी रखना।
9 . जिला सभाओं और महासभा कार्यालयों से सम्पर्क रखना एवं आवश्यक हो तो भ्रमण करना।
10 . प्रदेश सभा को गतिशील रखने में अध्यक्ष/उपाध्यक्षों को सहयोग देना।
11 . प्रदेश सभा की ओर से समस्त पत्र व्यवहार करना। समस्त कानूनी कार्यवाही करना, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना और मामलों की पैरवी करना। सम्पति की सुरक्षा हेतु अन्य वैधानिक कार्यवाही करना
12 . अपने स्वविवेक से 2 हजार रूपये तक (एक मुश्त) खर्च करने की स्वीकृति अध्यक्ष से सहमति लेकर देना। इसका हिसाब कार्यसमिति की अगली बैठक में प्रस्तुत कर अनुमोदन कराना।
13 . अन्य सभी आवश्यक कार्यवाही करना जो प्रादेशिक सभा के हित में हो और वांछित हो।
14 . वार्षिक लेखे तैयार कराकर उनका ऑडिट कराना तथा कार्यसमिति से स्वीकृत कराकर प्रदेश कार्यकारी मण्डल से अनुमोदन कराना।
15 . दान, भेंट, चन्दा चल-अचल सम्पति संस्था के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर स्वीकार करना। प्राप्त चैक/ड्राफ्ट/नकद आदि को अर्थमंत्री को जमा खर्च हेतु भेजना।
16 . निर्णयानुसार बैंक खातों को अर्थमंत्री को जमा खर्च हेतु भेजना ।
17 . सहमंत्री/संयुक्तमंत्रीयों में कार्य विभाजन करना।
अर्थमंत्री
1 . वार्षिक लेखा-जोखा तैयार करना।
2 . प्रदेश मंत्री के परामर्श से बजट बनाना, उसे कार्यसमिति एवं कार्यकारी मण्डल से अनुमोदित कराना। स्वीकृत बजट के अनुसार अर्थ संग्रह की योजना बनाना, अर्थ संग्रह करना और खर्चों पर नियन्त्रण रखना।
3 . चन्दा/शुल्क/अनुदान/भेंट आदि प्राप्त कर रसीद देना।
4 . संस्था के आय-व्यय का हिसाब रखना। हिसाब की आन्तरिक अंकेक्षक से जांच कराना एवं चार्टड अकाउन्टेन्ट से ऑडिट कराना। कार्यसमिति में स्वीकृति हेतु प्रस्तुत करना।
5 . अपने पास इम्प्रेस्टमनी के रूपये में अधिकतम 5000/- रू. तक नकद राशी रखना तथा स्व विवेक से 1000/- रूपये का व्यय मंत्री की सहमती से करना।
6 . प्रदेश मंत्री के परामर्श से बैंक खातों के संचालन का कार्य करना।
संगठन मंत्री -
1 . संगठन को सक्रिय रखना तथा भ्रमण व प्रचार आदि करके संगठन को सुदृढ़ बनाना। प्रदेश कार्यकारी मण्डल, कार्यसमिति, अध्यक्ष व मंत्री के निर्देशानुसार विभिन्न संगठनात्मक कार्य सम्पादित करना/कराना। सम्भागीय उपाध्यक्षों व संयुक्त मन्त्रियों से निरन्तर सम्पर्क में रहना तथा उन्हें सक्रिय रखना। सम्भागों में जिला सभाओं के गठन कराने का ध्यान रखना व गठन कराना, सम्भाग स्तर पर समय-समय पर बैठकों का आयोजन कराना, महासभा व प्रदेश के कार्यक्रमानुसार सम्भाग में जिला सभाओं को गतिशील रखना। स्थानीय विवादों को सुलझाने हेतु आवश्यक कार्यवाही करना। संगठन को गजबूत रखना।
2 . अपने क्षेत्र की प्रगति रिपोर्ट हर छः माह में प्रदेश मंत्री को प्रस्तुत करना।
सहमंत्री -
1 . प्रदेश मंत्री की अनुपस्थिति में सभा संचालन करना, कार्यवाही का रिकार्ड रखना तथा प्रदेश मंत्री को हर कार्य में सहयोग देना।
2 . प्रदेश मंत्री व अध्यक्ष के निर्देशानुसार कार्य कर सहयोग प्रदान करना।
संयुक्त मंत्री -
1 . अध्यक्ष, प्रदेश मंत्री व संभागीय उपाध्यक्षों के द्वारा दिए गए कार्यों का संचालन करना एवं कार्यवाही आदि रिकार्ड कर प्रदेश मंत्री को प्रेषित करना।
2 . अन्य कार्य को अध्यक्ष/मंत्री, संभागीय उपाध्यक्ष द्वारा सौंपे जावे, उनको सम्पादित करना।
3 . संगठन को सुदृढ़ व गतिशील रखने में प्रदेश मंत्री को एवं सम्भाग के उपाध्यक्ष को व अध्यक्ष को सहयोग देना।
4 . अपने जिम्मे आये कार्य विभाजन को सम्पन्न करने में सहयोग प्रदान करना।
5 . अन्य कार्य जो प्रदेश सभा के हित में आवश्यक हो करना।
6 . सम्भागीय उपाध्यक्ष व संगठन मंत्री के साथ सम्भाग का समय-समय पर भ्रमण करना तथा सम्भाग में गतिशीलता कायम रखना। सम्भाग में विभिन्न गतिविधियां और सम्भागीय सभाएं आदि आयोजित कराना तथा हर छ माह में प्रगति रिपोर्ट प्रदेश मंत्री को प्रस्तुत करना।
18 सभा का आर्थिक वर्ष एवं कोष :-
1 . सभा का आर्थिक वर्ष (हिसाबी वर्ष) 1 अप्रेल से 31 मार्च तक माना जावेगा।
कोष निम्न प्रकार से संचित होगा :-
(अ) चन्दा (उ) राजकीय अनुदान
(आ) शुल्क (ऊ) विज्ञापन एवं अन्य साधन
(इ) अनुदान (ए) अन्य विविध स्तोत्र से प्राप्त
(ई) सहायता या सहयोग
2 . उक्त प्रकार से संचित राशी किसी शिडयूल्ड बैंक अथवा पोस्ट ऑफिस में सुरक्षित निवेश की जायेगी। आवश्यकतानुसार स्थाई निधि का निर्माण भी किया जा सकेगा।
3 . अध्यक्ष, मंत्री, अर्थमंत्री में से किन्ही दो पदाधिकारियों के संयुक्त हस्ताक्षरों से बैंक में लेन-देन व व्यवहार हो सकेगा। परन्तु अर्थमंत्री के हस्ताक्षर आवश्यक होंगे।
19 कोष सम्बन्धी विशेषाधिकार :-
संस्था के हित में तथा कार्य व समय की आवश्यकतानुसार बजट के अलावा निम्न पदाधिकारी खर्च हेतु राशी एक समय में एक मुश्त स्वीकृत कर सकेंगे।
1 अध्यक्ष - 5 हजार रूपये
2 मंत्री - 2 हजार रूपये
3 कोषाध्यक्ष - 1 हजार रूपये
उपरोक्त राशी के खर्च का अनुमोदन कार्यसमिति से कराया जाना आवश्यक होगा।
20 पारिश्रमिक :-
सभासद के नाते किसी सदस्य/कार्यकर्ता को पारिश्रमिक के रूप में सभा की आय का कोई भाग नहीं मिलेगा। परन्तु सभा के लिए विशेष सेवायें प्राप्त होने पर सभा कार्यालय (अध्यक्ष /प्रदेश मंत्री) से पूर्व अनुमति लिए जाने पर किसी कार्यकर्ता को उसकी सेवाओं के लिए पारिश्रमिक दिया जा सकेगा। सभा के कार्य हेतु पदाधिकारी या प्रदेश कार्यकारी मण्डल के सदस्य अध्यक्ष की पूर्वानुमति से भ्रमण करेंगे तो उन्हें वास्तविक मार्ग व्यय दिया जा सकेगा।
21 प्रदेश अधिवेशन :-
1 . प्रदेश अधिवेशन साधारणतया तीन वर्ष में एक बार होगा। अधिवेशन के आयोजन का स्थान किसी जिला सभा के निमन्त्रण पर निश्चित होगा। साधारण अधिवेशन में प्रदेश सभा की प्रवृतियों को प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जावेगा। अधिवेशन में सामाजिक मार्गदर्शन एवं सामान्य लाभ के लिए उपयुक्त प्रस्ताव स्वीकृत किय जावेंगे तथा समाजोत्थान की योजनाये निर्धारित या स्वीकृत की जा सकेगी। अधिवेशन में कोई प्रस्ताव अथवा योजना उपस्थित सदस्यों के 2/3 मतों द्वारा स्वीकृति देने पर ही स्वीकृत मानी जायेगी।
2 . स्वागत समिति एवं गठन - अधिवेशन के सम्बन्ध में निश्चिय होने पर अधिवेशन सम्बन्धी कार्यवाही के लिए आमन्त्रण देने वाली जिला सभा स्वागत समिति का संयोजक नियुक्त कर कार्य प्रारम्भ करेगी। 30 या उससे अधिक स्वागत समिति के सदस्य बनने पर उनमें से स्वागत समिति के पदाधिकारियों का निर्वाचन होगा। स्वागत समिति का कर्त्तव्य होगा कि अधिवेशन के बाद उसका विवरण छपवा कर प्रतिनिधियों के पास भेजे। अधिवेशन के समय जब तक अध्यक्ष अपना स्थान ग्रहण न कर ले तब तक अधिवेशन के कार्य संचालन सम्बन्धी उत्तरदायित्व स्वागत समिति के अध्यक्ष पर होगा।
3 . प्रतिनिधि निर्वाचन -
(अ) प्रदेश का प्रत्येक माहेश्वरी बन्धु अधिवेशन में प्रतिनिधि बन सकेगा उसे स्वागत समिति द्वारा निर्धारित प्रतिनिधि शुल्क देना होगा।
(ब) अधिवेशन के लिए स्थानीय संस्थाएं अपने-अपने प्रतिनिधि भेज सकेगी।
4 . प्रस्तुत होने वाले प्रस्ताव -
अधिवेशन में प्रस्तुत होने वाले प्रस्ताव एक माह पूर्व प्रादेशिक सभा के मंत्री के पास पहुंच जाना चाहिए ताकि उन्हें व्यवस्थित रूप दिया जा सके। प्राप्त प्रस्तावों को दृष्टि में रखते हुए तथा समाज की ज्वलंत समस्याओं पर विचार करके अन्य प्रस्ताव अधिवेशन में प्रस्तुत करने के लिए कार्यसमिति द्वारा विषय निर्वाचिनी समिति गठित की जावेगी जो अधिवेशन से पूर्व आवश्यक प्रस्ताव तैयार करेगी।
विषय निर्वाचिनी समिति में अस्वीकृत कोई प्रस्ताव अध्यक्ष की विशेष आज्ञा से ही अधिवेशन में प्रस्तुत किया जा सकेगा। अधिवेशन द्वारा लिए गए आदेशात्मक प्रस्तावों का पालन करना प्रदेश पदाधिकारियों, कार्यसमिति एवं प्रदेश कार्यकारी मण्डल के सदस्यो का नैतिक उत्तरदायित्व होगा।
22 निर्वाचन प्रक्रिया :-
1. प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा दिए गए निर्देशों को ध्यान में रखते हुए जिला सभाओं का विधिवत गठन कराकर वहां से प्रदेश कार्यकारी मण्डल तथा महासभा कार्यकारी मण्डल हेतु प्रतिनिधियों के चुनाव कराये जावेंगे।
2. प्रदेश कार्यकारी मण्डल व महासभा के लिए प्रतिनिधियों के निर्वाचन हेतु प्रत्येक जिला सभा पर प्रदेश द्वारा एक पर्यवेक्षक की नियुक्ति करके चुनाव कराये जावेंगे।
3. प्रदेश के अध्यक्ष तथा प्रदेश कार्यसमिति के चुनाव की तिथि निर्धारित होते ही उसकी सूचना अ.भा.माहेश्वरी महासभा को पर्यवेक्षक की नियुक्ति करने हेतु भेजी जावेगी।
4. जिला स्तर पर समय से चुनाव नहीं होने पर निम्न प्रक्रिया अपनाई जावेगी -
(अ) किसी भी जिला सभा का समय पर चुनाव नहीं होने पर प्रादेशिक सभा अध्यक्ष उक्त सभा को उचित नोटिस देकर स्पष्टीकरण मागेंगे तथा जिला सभा द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण से सन्तुष्ट नहीं होने पर कार्यसमिति की बैठक में प्रस्ताव पास करा उसे भंग कर सकेंगे एवं उन क्षेत्रों में चुनाव कराने तथा नये पदाधिकारियों के पदग्रहण करने तक संस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु संयोजक अथवा तदर्थ समिति का मनोनयन कर उसकी सूचना सम्बन्धित जिला सभा को दी जावेगी।
(आ) भंग की गई सभा का चुनाव नियुक्त संयोजक/तदर्थ समिति द्वारा चार माह में कराना होगा।
(इ) किसी भी सभा को भंग करने से पूर्व उसे उचित नोटिस दिया जावेगा तथा प्राप्त स्पष्टीकरण पर कार्यसमिति में विचार करने के बाद ही उसे भंग किया जायेगा।
5. चुनाव बैठक की सूचना कोरियर डाक/यू.पी.सी. से भिजवाई जावेगी। यदि किसी को चुनाव सूचना प्राप्त नहीं हुई तो इस आधार पर कार्यवाही अवैध नहीं मानी जावेगी।
6. प्रादेशिक सभा का सदस्य खुद उपस्थित होकर ही मतदान कर सकता है मत देने का अधिकार स्थानान्तरित या हस्तान्तरित नहीं किया जा सकेगा।
7. कोई भी पदाधिकारी दो कार्यकाल की अवधि के बाद पुनः उसी पद के लिए एक सत्र तक चुनाव नहीं लड़ सकेगा।
23 मतगणना :-
चुनाव गुप्त मतदान प्रणाली से होगा। चुनाव के अलावा अन्य प्रकरणों में मतदान हाथ उठाकर भी हो सकता है। समान संख्या में मत प्राप्त होने पर अध्यक्ष को एक अतिरिक्त मत देने का अधिकार होगा अथवा चिट्ठी निकाल कर भी निर्णय लिया जा सकेगा।
24 कार्यकाल :-
प्रदेश कार्यकारी मण्डल तथा कार्यसमिति एवं पदाधिकारियों का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा, साधारणतः यह महासभा के कार्यकाल से संलग्न होगा, किन्तु किसी अपरिहार्य कारणों से निर्धारित अवधि में प्रदेश सभा का गठन नहीं हो सकने की स्थिति में प्रदेश कार्यकारी मण्डल अपना कार्यकाल अधिक से अधिक एक वर्ष तक और बढ़ा सकेगा।
25 आचार संहिता :-
1.महासभा द्वारा स्वीकृत आचार संहिता का प्रत्येक सदस्य एवं संस्था द्वारा पालन करना अपेक्षित है।
2.जिला अथवा क्षेत्रीय/सहसील सभाओं के सदस्यों द्वारा पत्र व्यवहार सम्बन्धित सभाओं के अध्यक्ष की मार्फत किया जावेगा, परन्तु शिकायती पत्र की प्रतिलिपि सीधी भेजी जा सकेगी। उच्च पदाधिकारियों द्वारा शिकायतों पर दो माह तक ध्यान नहीं देने पर शिकायतकर्ता अन्य पदाधिकारियों को इसकी जानकारी दे सकेगा, इसे अन्यथा पत्र व्यवहार आचार संहिता का उल्लंघन माना जावेगा।
26 सदस्यों द्वारा नियमों का उल्लंघन व अनुशासनात्मक कार्यवाही :-
महासभा और प्रादेशिक सभा के नियमों/अनुशासन आदि का बार-बार उल्लंघन करने वाले अथवा गम्भीर प्रकृति वाले मामलों तथा जिला सभा द्वारा भेजे गए मामलों एवं उपर धारा संखया 10 में आने वाले मामलों पर कार्यसमिति उचित कार्यवाही के पश्चात सम्बन्धित सदस्य की सदस्यता निलम्बित कर सकेगी। प्रदेश मंत्री के पास मामला आने पर प्रदेश मंत्री द्वारा सम्बन्धित सम्भागीय पदाधिकारियों क माध्यम से 15 दिन का समय देकर प्रारम्भिक जांच कराई जावेगी। सम्बन्धित सदस्य अपील कर सकेगा। अपील सुनने व निर्णय का अधिकार कार्यसमिति द्वारा नियुक्त अपील अधिकरण को होगा जिसका निर्णय अन्तिम रूप से मान्य होगा।
स्तरों पर समाप्त मानी जावेगी। सम्पूर्ण निर्णय प्रदेश कार्यकारी मण्डल की बैठक में सूचनार्थ प्रस्तुत कर दिया जावेगा। सामाजिक प्रश्नों व समस्याओं का निर्णय सामाजिक मंच पर ही किया जावेगा-कोर्ट में नहीं।
27 स्थाई कोष :-
सभा के कार्य को स्थाई रूप से चलाने के लिए सभा स्थाई कोष का निर्माण कर सकेगी। स्थाई कोष की राशी का प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार विनियोजन किया जा सकेगा।
28 रिक्त पद की पूर्ति :-
1. पदेन सदस्य के रिक्त पद की पूर्ति उसी पद पर आये नये सदस्य द्वारा होगी।
2. सत्र के मध्य में हुई पदाधिकारियों (अध्यक्ष के अलावा) व सदस्यों के रिक्त पदों की पूर्ति शेषकालावधि के लिए कार्यसमिति कर सकेगी।
3. अध्यक्ष पद यदि रिक्त होता है तो उस पद की पूर्ति प्रदेश कार्यकारी मण्डल द्वारा की जावेगी।
29 कानूनी कार्यवाही :-
सभा के कोष, सम्पति अथवा हिसाब आदि के सम्बन्ध में आवश्यकतानुसार कानूनी कार्यवाही मंत्री के पद नाम से की जायेगी और इस सम्बन्ध उन्हें आवश्यक अधिकार, वकालत नामा, दावा, जवाबदावा देने लेने आदि के अधिकार प्राप्त होंगे।
30 मध्यस्थ की नियुक्ति :-
जिला सभा में कोई विवाद उपस्थित होने पर कार्यसमिति आवश्यक जांच पड़ताल के पश्चात धारा 26 में आने वाले मामलों के अलावा अन्य विवादों में आवश्यक समझौता कराने के लिए मध्यस्थ की नियुक्ति कर सकेगी। विवाद निवारण समिति/मध्यस्थ का निर्णय अन्तिम माना जायेगा। इसे कोर्ट में नहीं ले जाया जावेगा। इस निर्णय से प्रभावित होने वाला सदस्य यदि प्रदेश अथवा महासभा का वर्तमान पदाधिकारी, प्रदेश अथवा महासभा की कार्यसमिति से अपील कर सकेगा।
31 भाषा :-
सभा की कार्यवाही देवनागरी लिपि में/हिन्दी भाषा में लिखी जायेगी।
32 विसर्जन :-
सभा के विसर्जन का प्रस्ताव यदि प्रदेश कार्यकारी मण्डल में कार्यसमिति की अनुशंषा पर प्रस्तुत होता है तो :-
1. इस हेतु प्रदेश कार्यकारी मण्डल सभा की विशेष बैठक बुलाई जावेगी।
2. सभा में आधे से अधिक सदस्यों की उपस्थिति होना अनिवार्य होगा।
3. उपस्थित सदस्यों में से निब्बे प्रतिशत के बहुमत से निर्णय होने पर ही प्रस्ताव पारित माना जावेगा।
4. ऐसी बैठक कम से कम 50 सदस्यों की मांग पर ही बुलाई जा सकेगी, विर्सजन की प्रक्रिया में प्रदेश सभा की समस्त सम्पति लेखे, अभिलेखे, प्रपत्र, कागजात आदि का हस्तान्तरण समान उद्देश्यों वाली संस्था को किया जा सकेगा।
33 इन नियमों के तहत अलग से नियम बनाना :-
संस्था अपने कार्यो को सुचारू रूप से संचालन क लिए आवश्यकतानुसार नियम/व्यवस्थाएं बना सकेगी जो इस विधान का हिस्सा समझा जावेगा।
34 इन नियमों के तहत अलग से नियम बनाना :-
सभा के विधान में आवश्यकतानुसार संशोधन हेतु समय-समय पर प्रस्ताव कार्यसमिति के एजेण्डा में प्रसारित होंगे और अनुमोदित होने पर प्रदेश कार्यकारी मण्डल के एजेण्डा में विचारार्थ रखे जा सकेंगे एवं उपस्थित सदस्यों के 2/3 बहुमत से परिवर्तन, परिवर्द्धन अथवा संशोधन किया जा सकेगा। ऐसी मिटिंग की सूचना मय प्रस्तावित संशोधन के प्रदेश कार्यकारी मण्डल के सदस्यों को एक माह पूर्व प्रसारित की जावेगी। विधान में संशोधन स्थगित मिटिंग में नही हो सकंगे। यदि प्रदेश कार्यकारी मण्डल के 50 प्रतिशत या इससे अधिक सदस्य विधान में संशोधन का कोई प्रस्ताव देते हैं तो उस पर प्रदेश कार्यकारी मण्डल सीधे भी विचार कर सकती है, परन्तु इसके लिए भी सदस्यो को मय प्रस्ताव के एक माह पूर्व सूचना देना आवश्यक होगा। किसी भी परिस्थिति में विधान की मूल भावना में परिवर्तन नहीं होगा।
35 अध्यक्ष का विशेषाधिकार :-
यदि किसी बिन्दु पर विधान में प्रावधान नहीं हो अथवा किसी बिन्दु पर आशय (इन्टरप्रीटेशन) की दृष्टि से कोई अस्पष्टता हो तो इन दशाओं में अध्यक्ष द्वारा नियुक्त समिति द्वारा दिया गया निर्णय / आशय (इन्टरप्रीटेशन) अन्तिम व मान्य होगा जिसे सामाजिक दृष्टिकोष को ध्यान में रखते हुए कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकेगा।
प्रादेशिक सभाओं के गठन के आधार
1. महासभा द्वारा प्रदेश सभाओं के लिए स्वीकृत मॉडल विधान के अनुरूप ही प्रदेश सभाएं अपना संविधान नियम एवं उप नियम बनायेगी तथा उसे महासभा से अनुमोदित कराना आवश्यक होगा। विधान में प्रदेश सभा के गठन के आधार में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जावेगा।
21. प्रत्येक प्रदेश सभा को महासभा द्वारा निर्धारित सत्र सम्बद्धता शुल्क प्रदान कर सम्बद्धता प्राप्त करना अनिवार्य होगा।
3. प्रदेश सभा तथा प्रदेश के अन्तर्गत वे जिला सभाएं जहां 2000 से अधिक परिवार रहते हैं, वहां जिला सभा/महानगरों की आंचलिक सभाओं में एक तथा प्रदेश सभा चुनाव हेतु दो पर्यवेक्षक महासभा द्वारा भेजे जायेंगे। अतः चुनावों की तिथि से कम से कम एक माह पूर्व चुनाव से सम्बन्धित सूचनाएं महासभा कार्यालय को भेज पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कराना होगा।
4. प्रादेशिक मण्डल के सभी चयनित एवं पदेन सदस्यों का अधिकार समान होगा।
5. प्रादेशिक मण्डल के सभी सदस्य मिलकर अध्यक्ष का निर्वाचन करेंगे। निर्वाचन के पश्चात अध्यक्ष द्वारा प्रदेश कार्यकारी मण्डल में खयातिप्राप्त शिक्षा शास्त्री, लोक सभा, राज्य सभा तथा विधान सभा के सदस्य, प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, पत्रकारों एवं समाज सेवियों में से पांच सदस्यों का मनोनयन किया जावेगा।
6. प्रादेशिक मण्डल द्वारा कार्यसमिति सदस्यों के चुनाव में जिला सभाओं को उचित एवं न्याय संगत प्रतिनिधित्व दिया जावेगा। इस हेतु प्रादेशिक मण्डल चाहे तो जिलवार सीटों का बंटवारा कर सकता है।
परिशष्ठ ''अ''
जिला सभाओं के गठन सम्बन्धी अन्य नियम
1.महासभा द्वारा जिला सभाओं के लिए स्वीकृत विधान के अनुरूप ही जिला सभा अपना संविधान, नियम एवं उपनियम बनायेगी तथा उसे प्रादेशिक सभा से अनुमोदित कराना आवश्यक होगा।
2.प्रत्येक जिला सभा के कार्य क्षेत्र का सीमांकन निर्धारण प्रादेशिक सभा कार्यसमिति द्वारा महासभा के दिशा-निर्देशानुसार किया जावेगा।
3. युवा एवं महिला संगठन के पदेन सदस्यों के अलावा अन्य युवा एवं महिलाएं जिला कार्यकारी मण्डल के सदस्य नहीं होंगे। केवल विशेष परिस्थिति में पूर्व से ही संगठन में सक्रिय रूप से कार्यरत महिला को परिवार से एक और सदस्य बनाया जा सकेगा।
4. जिला सभा कार्यकारी मण्डल सदस्यों की अन्तिम सूची का प्रकाशन सभी आपत्तियों के निवारण के पश्चात चुनाव की तिथि से 30 दिन पूर्व किया जावेगा।
5. जिला कार्यसमिति के चुनाव प्रदेश सभा द्वारा भेजे गए पर्यवक्षकों की देखरेख में होंगे। जिन जिला सभाओं में 2000 से अधिक परिवार निवास करते हैं वहां प्रदेश पर्यवेक्षकों के अलावा महासभा द्वारा भी आवश्यक होने पर पर्यवेक्षक भेजा जावेगा।
6. जिला मंत्री/चुनाव अधिकारी से अपेक्षा है कि वे कार्यकारी मण्डल सदस्यों की सूची मय पते व टेलिफोन नम्बर तथा चुनाव कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी चुनावों की तिथि से एक माह पूर्व प्रदेश मंत्री एवं 2000 से अधिक परिवार होने पर ही महासभा को भेजे। उस सूची पर जिलाध्यक्ष एवं जिला मंत्री के प्रत्येक पृष्ठ पर हस्ताक्षर आवश्यक है।
7. अधिकृत मतदाता सूची प्रतिपृष्ठ दो रूपया लेकर मांगने पर मतदाताओं को उपलब्ध कराई जावेगी।
8. चुनाव सम्बन्धी नियमोपनियम जिला कार्यसमिति द्वारा स्वीकृत किय जायेंगे जो मान्य चुनाव आचार संहिता एवं नियमों के अनुसार होंगे।
9. चुनाव सम्पन्न होने पर उसका प्रतिवेदन चुनाव अधिकारी एवं पर्यवेक्षकों के हस्ताक्षर से प्रदेश सभा को भेजा जावेगा।
10. जिला सभा कार्यकारी मण्डल के गठन के सम्बन्ध में परिशिष्ट ''बी-- एवं विधान की धारा 8 (1) के अनुसार कार्यवाही करना आवश्यक है।
परिशष्ठ ''ब''
जिला सभाओं के अन्तर्गत तहसील सभाओं के गठन के आधार
1. प्रत्येक ग्राम/नगर, जिसमें न्यूनतम 10 परिवार निवास करते हो, वहा स्थानीय सभा का गठन किया जावेगा। स्थानीय सभा अपने सदस्यों में से वांछित संखया में तहसील कार्यकारी मण्डल हेतु सदस्यों का चयन करेगी। चुनाव में स्थानीय सभा के न्यूनतम 50 प्रतिशत सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक होगी।
2. ग्राम/नगर या स्थानीय सभा प्रति परिवार जिला कार्यसमिति द्वारा निर्धारित सदस्यता शुल्क लेगी। स्थानीय/ग्राम सभा की सदस्यता हेतु सम्बन्धित परिवार के मुखिया अथवा उनके द्वारा नामित व्यक्ति से सदस्यता आवेदन पत्र भराया जावेगा। महिला एवं युवा संगठन का सदस्य स्थानीय/ग्राम सभा का सदस्य नहीं बन सकेगा। स्थानीय सभा को अपने क्षेत्र में रहने वाले माहेश्वरी परिवारों में से कम से कम 60 प्रतिशत परिवारों को सदस्य बनाना आवश्यक होगा। यदि कोई महिला पूर्व में ही मुखय संगठन में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हो तो उसे विशेष परिस्थिति में स्थानीय सभा की सदस्यता दी जा सकेगी।
3. जिस नगर में एक हजार से अधिक परिवार निवास करते हैं वहां सुविधानुसार क्षेत्रीय सभाओं का गठन किया जावेगा। ऐसी सभी क्षेत्रीय सभा को नगर सभा से सम्बद्धता प्राप्त करनी होगी। इसी प्रकार ऐसे शहर जिनका क्षेत्रफल विस्तृत है किन्तु परिवारों की संखया 500 से 1000 के बीच है वहां भी नगरीय तहसील सभा का गठन किया जावेगा। वहां की क्षेत्रीय सभाएं ग्राम/नगर सभा के समान ही होगी।
4 . प्रत्येक तहसील में कार्यकारी मण्डल के चयनित सदस्यों की संखया निम्न प्रकार से होगी :-
(अ) तहसील क्षेत्र में 25 परिवारों के कम होने पर सभी परिवारों के मुखिया अथवा उनके द्वारा नामित सदस्यों का कार्यकारी मण्डल होगा।
(ब) 26 से 100 परिवारों पर कार्यकारी मण्डल सदस्यों की संख्या अधिकतम 31 होगी।
(स) 101 से 500 परिवारों पर कार्यकारी मण्डल सदस्यों की संखया अधिकतम 51 होगी।
(द) 500 से अधिक परिवार होने पर कार्यकारी मण्डल सदस्यों की संखया अधिकतम 101 होगी।
5. तहसील संगठनो के क्षेत्र में निवास कर रहे नीचे लिखी श्रेणियों में आने वाले सदस्य तहसील कार्यकारी मण्डल पर पदेन सदस्य होंगे। इन्हें वे सभी अधिकार प्राप्त होंगे जो चयनित सदस्यों को प्राप्त है।
(क) जिला संगठन के विधान की धारा 7 (2) में वर्णित सभी पदेन सदस्य।
(ख) तहसील सभा के निवर्तमान अध्यक्ष व मंत्री।
नोट - उपरोक्त सभी सदस्य तहसील की कार्यसमिति में कोई पद ग्रहण नहीं करेंगे।
6. ऊपर (4) व (5) में वर्णित लिए गए सदस्यों की सभा तहसील सभा कार्यकारी मण्डल कहलावेगी। ये सभी मिलकर तहसील कार्यसमिति हेतु एक अध्यक्ष एवं 11 सदस्य चुनेंगे। इनके अलावा अध्यक्ष द्वारा दो तथा जिला कार्यसमिति द्वारा एक सदस्य का मनोनयन किया जावेगा।
7. ऊपर (6) के अनुसार चुने गए अध्यक्ष व सदस्य अपने में से नीचे लिखे अनुसार पदाधिकारी चुनेंगे -
1 उपाध्यक्ष- एक 2 मंत्री-एक
3 सहमंत्री-एक 4 कोषाध्यक्ष-एक
5 संगठन मंत्री-एक 6 शेष कार्यसमिति के सदस्य होंगे।
8. प्रत्येक तहसील कार्यकारी मण्डल सदस्यों में से तहसील कार्यसमिति में सम्बन्धित जिला सभा कार्यसमिति द्वारा एक सदस्य मनोनीत किया जावेगा। जिसे अन्य सदस्यों की भांति सभी अधिकार प्राप्त होंगे। जिला संगठन के विधान की धारा 11 (क) में वर्णित सभी सदस्य जो तहसील क्षेत्र में निवास करते हैं, वे सभी तहसील कार्यसमिति के पदेन सदस्य होंगे।
9. जिला सभा कार्यकारी मण्डल में प्रत्येक तहसील के परिवारों की संखया के आधार पर सदस्य संखया निश्चित की जावेगी। इनका चयन तहसील कार्यकारी मण्डल प्रत्येक गांव के परिवारों की संखया को ध्यान में रखकर उचित प्रतिनिधित्व देते हुए करेंगे।
10. तहसील कार्यकारी मण्डल एवं कार्यसमिति के निर्वाचन हेतु निर्वाचन प्रक्रिया, मतगणना, आचार संहिता तथा सदस्यों द्वारा नियमों का उल्लंघन व अनुशासनात्मक कार्यवाही के नियम प्रदेश एवं जिला सभा के विधान के अनुरूप होंगे।
11. प्रत्येक तहसील सभा के चुनाव हेतु कार्यक्रम बनाकर एक माह पूर्व कार्यकारी मण्डल सदस्यों की सूची उनके पतों सहित सदस्यों में प्रसारित कर आपत्तियों का निवारण कर अन्तिम सूची सम्बन्धित जिला सभा को स्वीकृति हेतु भेजेगी। चुनाव प्रक्रिया में तिथि, स्थान, समय, पदों हेतु नामांकन पत्र प्रस्तुत करने, नाम वापस लेने, अन्तिम रूप से अधिकृत प्रत्याशियों की सूची प्रकाशित करने आदि की सूचना स्पष्ट रूप से प्रकाशित की जानी अनिवार्य होगी। स्थानीय सभा द्वारा चयन सूची पर स्थानीय सभा के अध्यक्ष, मंत्री तथा तहसील सभा के पर्यवेक्षकों के हस्ताक्षर आवश्यक है स्थानीय सभा के चयन प्रक्रिया कार्य विवरण की फोटो कॉपी उपरोक्त पत्रों के साथ संलग्न की जावें।
12. तहसील कार्यसमिति के चुनाव कराने हेतु जिला सभा से पर्यवेक्षक बुलाना अनिवार्य होगा। उसकी मौजूदगी में चुनाव कराए जावेंगे। पर्यवेक्षक को इस चुनाव से सम्बन्धित सभी पत्र जिला सभा द्वारा उपलब्ध कराये जायें। चुनाव सम्पन्न होने पर उसकी रिपोर्ट जिला अध्यक्ष, मंत्री को शीघ्र सभी पत्रों के साथ प्रेषित की जावेगी।
13. प्रत्येक ग्राम को एक इकाई मानते हुए तहसील सभा को जिला सभा से सम्बद्धता प्राप्त करने के लिए जिला कार्यसमिति द्वारा निर्धारित सम्बद्धता शुल्क देना होगा।
14. तहसील सभाएं कार्य संचालन हेतु जिला सभा के विधान की भावना के अनुरूप नियम बना सकेगी। इन्हें सम्बन्धित जिला संगठन की कार्यसमिति से स्वीकृत कराना आवश्यक होगा।
शहरी क्षेत्रीय तहसील सभाएं
15. जिस शहर में १००० से अधिक परिवार रहते हैं, वहां शहरी क्षेत्रीय तहसील सभा का गठन किया जावेगा। इस हेतु शहर को परिवारों की संखया तथा भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित किया जावेगा। प्रत्येक क्षेत्रीय सभा स्थानीय सभा के समाज ही कार्य करेगी। क्षेत्र में निवास करने वाले प्रत्येक परिवार के मुखिया अथवा उसके द्वारा नामित व्यक्ति को क्षेत्रीय सभा का सदस्य बनाया जावेगा। प्रत्येक सदस्य को जिला संगठन द्वारा निर्धारित सदस्यता शुल्क देय होगी। क्षेत्रीय सभा के गठन की प्रक्रिया स्थानीय संगठन के अनुरूप होगी। परिशिष्ट ''ब'' की धारा 3 के अनुसार भी शहरी क्षेत्रीय तहसील सभाओं का गठन किया जावेगा।
1 शहरी तहसील सभा कार्यकारी मण्डल के चयनित सदस्यों की संखया निम्न प्रकार से होगी।
(अ) जिस शहर में 1000 से 3000 परिवार रहते हैं - 101
(ब) जिस शहर में 3000 से अधिक परिवार रहते हैं - 151
(अ) जिस शहर में 500 से 1000 परिवार रहते हैं - 71 (परिशिष्ट ''ब'' की धारा 3)
2 प्रत्येक क्षेत्रीय सभा से शहरी तहसील कार्यकारी मण्डल हेतु सदस्य संखया निम्न प्रकार से तय की जावेगी।
शहरी क्षेत्र के कुल परिवारों की संखया - शहरी तहसील के कार्यकारी मण्डल के सदस्यों की संख्या ।
3 शहरी क्षेत्रीय सभा कार्यसमिति में 2000 सदस्य परिवारों तक 21१ तथा इससे अधिक परिवार होने पर 31 सदस्यों की पदाधिकारियों सहित कार्यसमिति का गठन किया जावेगा।
4 शहरी तहसील कार्यकारी मण्डल में क्षेत्रीय सभा के अध्यक्ष एवं मंत्री को भेजना आवश्यक होगा।
5 शहरी क्षेत्रीय सभाओं का सीमांकन शहरी तहसील सभा कार्यसमिति की अभिशंषा को ध्यान में रखते हुए जिला सभा कार्यसमिति द्वारा किया जावेगा।
6 शहरी तहसील सभा के गठन की अन्य प्रक्रियाएं यथा वोटर लिस्ट चयन प्रक्रिया कार्यक्रम आदि तहसील सभा के गठन के अनुसार ही है।
7 शहरी तहसील सभा प्रत्येक क्षेत्रीय सभा से जिला संगठन की कार्यसमिति द्वारा निर्धारित सम्बद्धता शुल्क प्रति सत्र लेगी एवं सम्बद्धता प्रमाण पत्र जारी करेगी।
8 शहरी क्षेत्रीय सभाएं जिला सभा कार्यकारी मण्डल हेतु सदस्यों का निर्वाचन उनको आवंटित संख्या के अनुसार करेगी।
9 शहरी क्षेत्रीय सभाओं तथा शहरी तहसील सभा के चुनावों में जिला सभा के पर्यवेक्षकों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।
10 जिन शहरी तहसील सभाओं में परिवारों की संखया 3000 से अधिक है, वहां कार्यसमिति के चुनाव हेतु प्रदेश सभा से भी पर्यवेक्षक भेजा जावेगा।
11 शहरी स्तरीय तहसील सभा में भी पदेन सदस्य उसी प्रकार से होंगे जैसा तहसील सभा गठन बिन्दु संखया 5 में दिया गया है।
12 शहरी तहसील सभा कार्यकारी मण्डल द्वारा अध्यक्ष एवं कार्यसमिति हेतु 25 सदस्यों का निर्वाचन क्षेत्रीय सभाओं को उचित प्रतिनिधित्व देते हुए किया जावेगा। अध्यक्ष के निर्वाचन के बाद नवनिर्वाचित अध्यक्ष कार्यसमिति हेतु 5 सदस्यों का मनोनयन करेंगे। कार्यसमिति के 31 सदस्य (अध्यक्ष सहित) कार्यसमिति के पदाधिकारियों का चयन करेंगे, पदाधिकारियों के पदों की संख्या एवं नाम का निर्णय शहरी तहसील सभा के विधान के अनुसार होगा।
16. महासभा द्वारा स्वीकृत मॉडल विधान के अनुसार ही प्रदेश, जिला/आंचलिक, तहसील/शहरी तहसील सभा का गठन आवश्यक होगा। ऐसा न होने पर महासभा, उस प्रदेश सभा उनके जिला व तहसील सभाओं के चुनाव अपने पर्यवेक्षकों की देखरेख में मॉडल विधान व श्रृंखलाबद्ध संगठन की भावना को ध्यान में रखते हुए करा सकेगी और इस तरह से चयनित प्रदेश सभा/जिला ही उस प्रदेश का प्रतिनिधित्व महासभा में करेगी। इस कार्य हेतु महासभा आवश्यकतानुसार विभिन्न स्तरों के लिए तदर्थ समितियों का गठन कर सकेगी।
17. अनेक प्रदेशों में स्थानीय तहसील जिला अथवा प्रदेश सभाएं संस्था रजिस्ट्रीकरण अधिनियम के अन्तर्गत रजिस्टर्ड है। उन सभी संगठनों को अपने विधान एवं नियमावली में परिवर्तन मॉडल विधान के अनुसार करना होगा। अन्यथा उन्हें सम्बद्धता प्रदान नहीं की जावेगी। किसी भी विवाद में कोर्ट में जाने वाले व्यक्ति अथवा संगठन की सम्बद्धता निरस्त करने का अधिकार उसको सम्बद्धता प्रदान करने वाली सभा को होगा।
परिशिष्ट''स''
(महानगरीय आंचलिक (जिला) सभाओं के गठन की प्रक्रिया)
श्रृंखलाबद्ध संगठन को सुदृढ़ एवं गतिशील बनाने तथा प्रत्येक परिवार को संगठन की मुखय धारा से जोड ने के दृष्टिकोण से प्रदेश एवं जिला सभाओं के विधानों में परिवर्तन करना समय की आवश्यकता है। कोलकाता, दिल्ली एवं मुम्बई महानगरों को प्रादेशिक सभा के रूप में मान्यता है। इन महानगरों में क्रमश: 10, 8 और 8 आंचलिक सभाएं है, जिन्हें जिला सभा का दर्जा प्राप्त है। इन महानगरों में श्रृंखलाबद्ध संगठन की प्रथम ईकाई आंचलिक सभाएं है। सभी आंचलिक सभाओं के विधान एवं चुनाव में एक रूपता रहें तथा प्रत्येक परिवार की भागीदारी संगठन में सुनिश्चित की जा सके इस दृष्टि से उनके विधानों में परिवर्तन करना आवश्यक है। इस दृष्टि से निम्न मार्गदर्शन बिन्दु दिये जा रहें है :-
1. प्रत्येक परिवार का मुखिया अथवा उसके द्वारा नामित व्यक्ति को सम्बन्धित आंचलिक सभा का सदस्य बनाया जावेगा। प्रत्येक सदस्य से आंचलिक सभा की कार्यसमिति द्वारा निर्धारित सदस्यता शुल्क ली जावेगी। आंचलिक सभा के गठन हेतु उस क्षेत्र में रहने वाले कम से कम 40 प्रतिशत परिवारों को सदस्य बनाना आवश्यक होगा।
2. परिवार से तात्पर्य एक ही रसोईघर में भोजन करने वाले सदस्यों से है।
3. परिवार में जो व्यक्ति महिला एंव युवा संगठन का सदस्य है सामानयतः उसे क्षेत्रीय सभा की सदस्यता नहीं दी जावेगी, किन्तु यदि कोई महिला पूर्व से ही आंचलिक संगठन से सक्रिय रूप से जुडी हुई है तो उसे भी विशेष परिस्थिति में आंचलिक सभा की सदस्यता दी जा सकेगी।
4. आंचलिक सभा के सभी सदस्य मिलकर आंचलिक कार्यकारी मण्डल का गठन इस प्रकार से करेंगे कि उस आंचल की अलग-अलग बस्तियों में रहने वाले परिवारों की संखया को ध्यान में रखते हुए उन्हें आनुपातिक रूप से आंचलिक कार्यकारी मण्डल में स्थान मिल सके इस हेतु प्रदेश सभा महासभा के मार्गदर्शन से सीटों का आवंटन भी कर सकती है।
5. प्रत्येक आंचलिक कार्यकारी मण्डल के चयनित सदस्यों की संख्या 151 से अधिक नहीं होगी।
6. आंचलिक कार्यकारी मण्डल में चयनित सदस्यों के अलावा जिला संगठन के विधान की धारा
7 (2) अ में वर्णित सभी महानुभाव जो सम्बन्धित आंचलिक सभा क्षेत्र में निवास करते हैं, पदेन सदस्य होंगे।
7. उपरोक्त चयनित एवं पदेन सदस्यों का मण्डल ही उस क्षेत्र का आंचलिक कार्यकारी मण्डल कहलायेगा। पदेन सदस्यों को भी वे सभी अधिकार प्राप्त होंगे जो चयनित सदस्यों को प्राप्त है।
8. आंचलिक कार्यकारी मण्डल के सदस्यों की वैध सूची सभी आपत्तियों के निराकरण के पश्चात आंचलिक कार्यसमिति के चुनावों के एक माह पूर्व सम्बन्धित प्रदेश सभा एवं महासभा कार्यालय को सदस्यों के पूर्ण पते एवं टेलिफोन नम्बर सहित अध्यक्ष एवं मंत्री के हस्ताक्षर से भेजी जावेगी। यह सूची सम्बन्धित सदस्यों को दो रूपया प्रति पृष्ठ शुल्क लेकर उपलब्ध कराई जावेगी।
9. आंचलिक कार्यसमिति के चुनाव में प्रदेश सभा अथवा विशेष परिस्थिति में महासभा के पर्यवेक्षक उपस्थित रहेंगे चुनाव सम्बन्धी सारा कार्यक्रम एवं नियमादि चुनाव आचार संहिता के अनुरूप होंगे।
10. आंचलिक सभा द्वारा संगठन के कार्यों को सुगमता से संचालन हेतु जिला संगठन के विधान की धारा 11 (क) के अनुसार पदाधिकारियों एवं कार्यसमिति का चयन करेगी।
11. आंचलिक सभा के चुनाव सम्बन्धी सारा विवरण प्रदेश एवं महासभा कार्यालय को चुनाव सम्पन्न होने के पश्चात तत्काल ही पर्यवेक्षक के हस्ताक्षर सहित भेजा जायेगा।
12. आंचलिक सभा को प्रदेश सभा से सम्बद्धता प्राप्त करना होगा, इसके लिए प्रदेश सभा की कार्यसमिति द्वारा निर्धारित सम्बद्धता शुल्क प्रति सत्र देना होगा।
13. अन्य नियम जिला सभाओं के अनुसार ही है।