जय महेश,
महासभा ने १९३१ में ही विधवाओं के पुनर्विवाह का प्रस्ताव पास किया,परिणाम स्वरूप नि:संतान विधवाओं का पुनर्विवाह होने लगा, जिसे आम समाज ने मान्यता प्रदान की|

वैश्वीकरण, संयुक्त परिवारोंका विघटन, परिवार में स्त्री-पुरुष दोनों का जीविकोपार्जन में लगा रहना, युवतियों का उच्च शिक्षित होना, समानता के अधिकार तथा राजनीती, उद्योग, सामाजिक कार्य एवं नौकरी के कारण किसी भी विधवा महिला को घर की चार दीवारी में बंद रहकर मरने को बाध्य नहीं किया जा सकता| उसे भी परिवार के अन्य सदस्यों की भांति ही समाज में रहने हेतु परिवार एवं रिश्तेदारों द्वारा दिया जाना चाहिए ताकि मानव जीवन की सार्थकता का बोध कर सके|

समाज के बन्धुओं से जानकारी मिली की आज भी कहीं कहीं दकियानुसी विचार वाले व्यक्तियों द्वारा पति की मृत्यु के बाद पीड़ित महिला की चुडियों को फोडना, उसके पैर की बिछुडीयों को हटा देना,द्वादशा के अवसर पर उसको शोकसूचक काले वस्त्र पहनाना तथा मेहेंदी, बिंदी व् कोरगोटे के वस्त्र नहीं पहनने देना आदि रिवाज बदस्तूर चालू है| पुराने समय में उस वक्त की सामाजिक व्यवस्थाओं ने इसे उचित माना किन्तु वर्तमान समय में इसे किसी भी रूप में कही भी स्वीकार नहीं किया जा सकता|एक ओर हमारा समाज महिलाओं को दुर्गा, लक्ष्मी एवं सरस्वती के समकक्ष दर्जा दे जीवन के हर क्षेत्र में उसे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित एवं प्रेरित कर रहा है,वहीं दूसरी ओर पुरानी प्रथा को स्वीकार कर विधवा बहनों के प्रति पुराने रिवाजों के अनुसार अमानवीय व्यवहार कर स्वयं को लज्जित कर रहा है|पति की मृत्यु के बाद विधवा बहनों के प्रति परिवारजन एवं रिश्तेदारों का व्यवहार इतना प्रतिकूल हो जाना अति दुर्भाग्यपूर्ण है|

हमें विचार करना चाहिए की विधवा बहिने भी घर की सम्मानित सदस्या है|हमें उन्हें अच्छा जीवन जीने, अपने दुःख को भुलाने हेतु अन्य महिलाओं की भांति ही पहनावे,खानपान तथा मिलने जुलने हेतु प्रेरित करना चाहिए ताकि वे अपना जीवन परिवार की अन्य महिलाओं की भांति ही व्यतित कर सके|उनकी योग्यतानुसार उन्हें परिवार के व्यवसायिक कार्यों की जिम्मेदारी भी सौंपी जा सकती है, उन्हें सेवा कार्यों हेतु प्रेरित किया जा सकता है अथवा उन्हें समाज एवं राष्ट्रसेवा में भाग लेने हेतु अग्रसर किया जा सकता है|

मैं सोचता हूँ की पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री के साथ जिस प्रकार के अमानवीय व्यवहार की पुरानी परिपाटी जहाँ कहीं भी चली आ रही है, उसे अब किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता|समाज के प्रभावशाली बुजुर्गजनों को इसे रोकने में पहल करना समय की आवश्यकता है|इसी के साथ साथ स्थानीय संघठन को भी समाज को विश्वास में लेकर इन प्रथाओं पर रोक लगाना चाहिए|

मै महिला संघठन की बहिनों से अनुरोध करूँगा की वे इस सम्बन्ध में महिलाओं को जागरूक कर तथा प्रचार प्रसार के माध्यम से विधवा महिलाओं पर होने वाले अमाननीय एवं असामाजिक व्यवहार को रोकने का प्रयास करे और उन्हें मानवोचित पुनर्वास व जीवनयापन के अवसर उपलब्ध कराने का पुनीत कार्य करे|

मै समाज की सभी बुजुर्ग भाई-बहनों से विनम्र अनुरोध करूँगा की पति की मृत्यु के बाद जहाँ कहीं भी विधवा बहनों के प्रति ऐसा व्यवहार कर उन्हें नारकीय जीवन जीने को बाध्य किया जाता है,उसे तत्काल रोका जावे|

रामपाल सोनी.


Copyright © All Rights Reserved www.maheshwariworld.org            Designed & Developed by Space Infotech